मंगलवार, 22 सितंबर 2009

"मैं चुनाव के पुर्व अश्वेत था"
निश्चित ही ओबामा का यह कथन हमें प्रेरणा दे सकता है....
आज हमारा समाज एक ऐसे छलावे में जी रहा हैं, जहां कोई दलित या पिछड़ा कभी भी अपने आप को सामान्य नहीं कहलाना चाह्ता......चाहे वह आर्थिक एवम सामजिक रूप से कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो जाये........
क्या आने वाला कल उन लोगों का होगा उच्च दलित या उच्च पिछड़ा कहें जाये.......
जरा सोंचिये......

8 टिप्पणियाँ:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

दलित की परिभाषा बदलनी होगी। उसे जातिआधारित नहीं आर्थिक रूप से जांचना होगा।

बेनामी ने कहा…

Sahi kaha,koi bhi shaktishalee dalit ya pichada apne ko samanya nahi banana chahata.Labh hee sarvopari hai.

Amit K Sagar ने कहा…

चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. सतत लेखन के लिए शुभकामनाएं. जारी रहें.

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Till 30-09-09 लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर] - होने वाली एक क्रान्ति!

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

जब दलित बनें रहने में ही पांचों ऊंगली घी में होंगीं तो सामान्य से क्या लाभ। आपकी सोच के लिये बधाई। कभी मेरे ब्लोग पर भी पधारें।

Unknown ने कहा…

Bahut Barhia... aapka swagat hai... isi tarah likhte rahiye...

thanx
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शशांक शुक्ला ने कहा…

भाई साहब अभी के वक्त भी दलित पिछड़ा जैसा कोई वर्ग नहीं है। औऱ जो लोग पिछड़े है उन्हें कुछ नहीं मिलता है, और जो उच्च पिछड़ा औऱ दलित है वो मलाई खा रहे है

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर ने कहा…

narayan narayan

Chandan Kumar Jha ने कहा…

बिल्कुल सही दिशा में सोच रहे है आप ।

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

गुलमोहर का फूल

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